शनिवार, 9 जनवरी 2021

"विस्मय के विकल्प" ललित निबन्ध संग्रह से (डॉ॰ जयशंकर त्रिपाठी)

साहित्य किसके लिए है ? साहित्य लिखने वालों की समस्या तथा विविध वादों मे साहित्य का वर्गिकरण आज की लेखन - धारा का विच्छिन्न प्रवाह है। साहित्य लिखने वाला यदि सचमुच दत्त-चित्त है तो वह यह समझता है कि देश को उसकी बड़ी आवश्यकता है और वह साहित्य लिखकर देश को अपनी मूल्यवान सेवा अर्पित कर रहा है।लोकतन्त्र कि राजनीति और आज के युग मे सोशल वर्कर तथा अपने को कलम का सिपाही मानने वाला साहित्य या पत्रकार बड़े अभिमान के साथ एक ही अहमियत कि घोषणा करतें हैं कि आपका जीवन , आपकी कलम सदा राष्ट्र के लिए , समाज के लिए समर्पित रही है । 
              संसार का विस्तार बहुत अधिक है ,ऊपर आकाश ,नक्षत्र ,तारे और आकाश गंगा है । पर क्या सब कुछ साहित्य का विषय है ? मनुष्य के मन ने अपने राग तथा पौरुष से जहां तक विजय प्राप्त की है उसकी अभिव्यक्ति साहित्य मे होती है । साहित्य मनुष्य समाज का सच्चा लोकतन्त्र है , साहित्य रचने वाले का विराट मन जब सभी से स्वतंत्र और उदात स्थिति मे होता है ,जीवन के वे क्षण उसके साहित्य की रचना करते हैं ,फिर वही साहित्य अपने समाज की नयी रचना करता । समाज और राष्ट्र मे शासन तथा साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं किन्तु पूर्णतया स्वतंत्र हैं । साहित्य स्वतंत्र होता है , वही शासन के तंत्र मे नहीं चलता । जब वह शासन के तंत्र मे होता है , वही उसके जीवन की संध्या है , रात्री है । 
                                                                                       

मंगलवार, 22 जनवरी 2019




आचार्य जयशंकर त्रिपाठी की नई पुस्तक 'रघुवंश का रचमान सौंदर्य ' है जो कि महाकवि कालिदास कृत रघुवंश का छः सर्गों अनुवाद है। यदि वे जीवित रहते तो १९ सर्गों का अनुवाद टिप्पणी सहित करते। अनुवाद करने के बीच ही वो दिवंगत हो गए , इसलिए अनुवाद का कार्य अधूरा ही रह गया । मौलिकता का अभाव न हो इसलिए उनके द्वारा किये छः सर्ग को ही मैंने प्रकाशित करा दिया। महाकवि कालिदास पर पूज्य पंडित जी का अध्ययन अप्रतिम है। इस पुस्तक के अनुवाद के अंत में तीन परिशिष्ट दिए गए हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण है , कवि कालिदास और नाटककार कालिदास के सम्बन्ध में पंडित जी के अपने मौलिक विचार रहें हैं जो शोधार्थी छात्रों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। पुस्तक प्राप्ति के लिए आप रत्नाकर प्रकाशन ratnakarprakshan1982@gmail.com से संपर्क कर सकतें हैं।

शनिवार, 27 जून 2015

                                 उपत्यका का अंकुर

                                                                                                                डॉ० ललित शुक्ल, दिल्ली

          वहॉ चलते हैं जहॉ विन्धायचल चट्टानों के वक्ष पर अमृत की धारा वाले  झरनों की स्रोतवाहिनी माला पहने है । इन पहाडी धाराओं की चाल सर्पिल है । तेज भागतीं है जैसे गन्तव्य जाने की बहुत जल्दी हो ।  व्यस्तता के क्षणों में भी वह गाती चलती है । आदमी भी प्रकृति के साथ गाता है । गाता क्या है , दिल खोलकर रख देता है । सुख-दुख के पुलिनों से आलिंगीत जीवन धारा भी कुछ ऐसे ही चलती है पर गॉव् की धरती पगडंडियों पर ि‍थरकती है । गॉव की बोली में दिल बोलने लगता है । और हरियाली की जिम्मेदारी नीम , पीपल , आम , जामुन और बरगद आदि पर है । अतीत के खण्डहरों से कवि संगीत टेरता है । वर्तमान का कवि - रचनाकार मूक पहाड को सचेत करता है ।फागुन सौरभ का भण्डार लुटा रहा है पर जानने वाले इस बात को जानतें हैं ,इस रहस्य को पहचानतें हैं । 
            यह वह दुनिया है , जहॉ पलाश के लाल लाल बादल सक्रिय रहतें  है । कवि की दृष्िट की सक्रियता की कर्मशाला से एक झॉकी ऑकती है , एक छवि उरेहती है । लाल लाल पहाड़ी पर मशालों की दीपमाला दीपित है । '' पी कहॉ '' की अनुगूॅज से वातावरण रोमॉचित हो उठता है ।टप -टप गिरते हुये महुआ के फूलों की रसीली ओर नशीली गंध दिग दिन्त नाचनें महकने लगता है । कवि की धरती को रसमय बनानेवाली पर्वत-पुत्रियॉ करुणावती , बेलन '(मुरला) , सिरसी और तमसा अपनी अपनी धाराओं में कहानी कहती हुई न जाने कब से बह रहीं हैं । यही है वो अंचल जो लोक मानस में आहलाद की उमंग भरता है । प्रकृति की इसी रम्यस्थली में डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी जी का बचपन बीता था । यहॉ यह कहना कदाचित अप्रासंगिक हो कि जन्म की तिथ्िा अगहन कृष्ण 12 संवत्  1985 थी । सकूनत में बेदौली , पोस्ट-बेदौली (भारतगंज) इलाहाबाद का नाम आता है ।
              परिवार में संस्कृत का पठन पाठन कई  पीढियों से चला आ रहा है । जीवन के अनेक कष्टों को झेलकर , विपदाओं के तूफानों से लड़तें हुये यह संस्कृत जीते जी कायम रहा । जयशंकर जी का साहित्य-सृजन वही से रस पाता रहा है । प्रेरणा का उर्वरक वहीं से हरितिमा देता रहा है । पिता वैयाकरण पं0 छविनाथ जी त्रिपाठी की पुरोहिती उन्हें वंश परम्परा से ही मिली थी । पौरीहित्य परिवार जिस संस्कृति और परम्परा का विधान करता है उसमें कलाकार और मौलिक रचनाकार की अस्िमता के लिए बहुत कम गुंजाइस रहती है । जयशंकर जी इस बात के अपवाद हैं । अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद भी वह तेजस्िवता को आदर और बहुमान देतें हैं । लोभ की जिस पोली जमीन पर पौरोहित्य की कच्ची इमारत  खड़ी होती है , वह उससे बहुत आगे निकल गये हैं । पितामह पं0 रमापति त्रिपाठी और प्रपितामह पं0 भैरव प्रसाद त्रिपाठी ज्येतिष और तंत्र की गहरी जानकारी के लिए अपने क्षेत्र में विश्रुत थे । पंचायती निरंजनी अखाड़ा द्वारा संचालित  पाठशाला में जयशंकर जी के पिता अध्यापन करते थे ।उन्होनें व्याकरण से मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण की थी । कर्मकाण्ड ,व्याकरण ,ज्योतिष औश्र तंत्र की आनुवांश्िाकता की उपज के रुप् में जयशंकर जी का व्यक्ितव हमारे सामने आता है । उनकी मॉं श्रीमती जगवन्ती देवी कुलीन परिवार की थी । उन्हें आन-बान और मर्यादा अपने पिता-पक्ष से ही मिली  थी । जयशंकर जी बतलातें हैं कि उनके पिता अत्यन्त सात्िवक ,सत्यनिष्ठ ,ऋष्िा जीवन के आदेशों से अनुप्रेरित थे । उनमें रुढियों की जकड़बन्दी न थी ।---------क्रमश:--

बुधवार, 13 मई 2015

आचार्य डॉ० जयशंकर त्रिपाठी जी की प्रसिद्द पुस्तकों में से एक पुस्तक "आचार्य दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास-दर्शन" जो कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी.फिल.उपाधि के लिए स्वीकृत शोध -प्रबंध का परिवर्तित रूप है | इस शोध प्रबंध के बारे में गुरुवर डॉ० सुरेश चन्द्र पाण्डेय जी (पूर्व संस्कृत विभागाध्क्ष ,इलाहाबाद विश्वविद्यालय ,इलाहाबाद ) १९६४ कि बात बताते हुए कहते हैं ( आपके ही निर्देशन में पूज्य पंडित जी ने शोध कार्य किया ) कि पंडित जी कि शोध प्रबंध जिन परीक्षक विद्वानों के पास परीक्षणार्थ भेजा गया उनकी टिप्पणी थी कि दण्डी के काल निर्धारण से यद्यपि हम सहमत नहीं किन्तु शोध कर्ता के तर्क शुद्ध अनेक प्रमाणों ने हमें आकृष्ट किया है और दण्डी के काल के विषय में पुनः विचार करने के लिए विवश कर दिया है |४५४ पृष्ठ की यह पुस्तक शोधार्थी छात्रों और दण्डी पर वृहत जानकारी के लिए बहुत ही उपयोगी पुस्तक है |
लोकभारती प्रकाशन ,१५-ए महात्मा गांधी मार्ग ,इलाहाबाद -211001से प्रकाशित है | अगर आप दण्डी पर शोध कर रहे हैं तो यह पुस्तक आपके शोध में अवश्य सहायक सिद्ध होगी |

" आंजनेय " खण्ड काव्य की भूमिका में डॉ० बलदेव प्रसाद मिश्र जी ने लिखा है कि पूज्य जयशंकर त्रिपाठी जी का 'आंजनेय ' काव्य जयशंकर 'प्रसाद' जी की "कामायनी " परंपरा में लिखा गया है | संयोग वश पूज्य आचार्य त्रिपाठी जी के सम्बन्ध में कुछ विद्वानो से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ तो उन्होंने भी "आंजनेय "के लिए यही कहा कि पंडित जी का यह काव्य 'कामायनी ' के समकक्ष है | पांच सर्गो में (शून्य सर्ग , पूर्व सर्ग ,दक्षिण सर्ग , पश्चिम सर्ग और उत्तर सर्ग ) विभक्त मात्र १०८ पृष्ठों का यह खण्ड काव्य प्रणव प्रकाशन ,४० -ए, मोतीलाल नेहरु रोड , इलाहाबाद -२११००२ से (1984) प्रकाशित है | निश्चय ही आज नहीं तो कल पंडित जी के इस काव्य का सही मूल्यांकन होगा | इतिहास साक्षी है इस बात का व्यक्ति और व्यक्ति के लिखे का सही मूल्यांकन उसके न रहने के बाद ही होता है |


पूज्य डॉ० जय शंकर त्रिपाठी जी का मौलिक निबंधों का संग्रह "आंठवा अमृत ",जो तमाम खूबियों की विविधता समेटे हुए है | उत्तर प्रदेश राज्य पुरस्कार से सम्मानित पंडित जी की सभी रचनाएं अपनी मौलिकता के लिए प्रसिद्द हैं | इस निबंध संग्रह में 'मूर्तिमान कुमार-सम्भव',साहित्य में में अमृत और विष ',रघुवंश का रचमान सौंदर्य', 'चार कल्पित आख्यान 'और गाँव अनजाना ' जैसे कई उत्कृष्ट निबंधों की श्रृंखला है जो साहित्य प्रेमियों को सहज ही प्रभावित करती है | कुल २७ निबंधों का यह संग्रह साहित्य में सच ही आंठवा अमृत है | प्रकाशक -विभा प्रकाशन ,५० चाहचंद इलाहाबाद से प्रकाशित |
 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

कल दिनांक ०७-९-२०१३ को पंडित डॉ0 जय शंकर त्रिपाठी आठवीं पुण्यतिथि के अवसर पर हिदुस्तानी एकेडमी ,सिविल लाइन्स इलाहाबाद के सभागार में सांयकाल ४.०० बजे एक साहित्यिक  संगोष्ठी का आयोजन किया गया |  इस अवसर पर पाँच विद्वानों  को सम्मानित भी किया गया ।  संगोष्ठी कार्यक्रम के कुछ छाया चित्र |



शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

कल दिनांक  07-9-2013  को प्रसिद्द साहित्यकार परमपूज्य आचार्य डॉ० जय शंकर त्रिपाठी जी की आठवीं पुण्यतिथि पर हिंदुस्तानी एकेडमी ,सिविल लाइन्स इलाहबाद  के सभागार में सायंकाल 4.00 बजे आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में आप सभी सादर आमंत्रित हैं …………आनंद  विक्रम |

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

पूज्य पिताजी पर लिखी अपनी एक पुरानी  पोस्ट आज शिक्षक दिवस के अवसर पर पुनः दोहराना चाहूँगा " जो उम्र भर पढ़ाते  रहे और पढ़ते रहे लोग उनसे".........................

                   परम पूज्य  डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी  को जून सन 1990 में ईश्वर शरण डिग्री कालेज ,इलाहाबाद से सेवानिवृत होने के बाद हमने कभी नहीं देखा कि उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन हुआ ।सिर्फ एक कालेज जाना छोड़कर बाकी सभी दिनचर्या उनकी यथावत रही ।बल्कि उनके पास आने वाले लोगों के स्वभाव व दिनचर्या बदल जाते थे ।अध्यात्म सम्बन्धी प्रवचन तो नहीं होता था लेकिन आध्यात्मिक चिंतन मनन होता रहता था । नौजवान साथियों को उनके पास आकर सुकून मिलता था , अपनापन मिलता था ।घर के बुजुर्ग की तरह से उनसे अपनी परेशानियाँ कहते थे और सुख दुःख बांटते थे व् कुछ नया करने से पहले उनसे राय लेते थे । पंडितजी पढ़ने पढ़ाने के पुराने व्यसनी थे । सुबह के अखबार के साथ साथ चाय पान उनकी पुरानी आदत थी , शायद हम लोगों के जन्म से पहले की । अखबार के छोटी सी छोटी खबर पर उनकी पैनी निगाह रहती थी ।खबरों को पढने के बाद उस पर चर्चा, सुबह के समय जो भी आगंतुक आते उनसे उन विषयों पर चर्चा हो जाती । वे अखबारों की बातों को चर्चा तक ही सीमित रखते थे और उसके बाद वे अपने दुसरे नित्य कर्मों में  लग जाते थे । पंडित जी किसी एक विषय के ज्ञाता या विद्वान नहीं वरन हिंदी संस्कृत के अतिरिक्त भूगोल , समाजशास्त्र और ज्योतिष आदि पर भी अधिकार रखते थे । इतिहास में उनकी बड़ी रुचि थी । इतिहास सम्बन्धी पंडित जी की बातें बड़ी प्रमाणिक हुआ करती थी , जिसे लोग आज भी याद करते है ।इतिहास लेखकों में वे अन्य लोगों के साथ भगवतशरण उपाध्याय जी के नाम की चर्चा अवश्य करते । ज्योतिष में उन्हें पांडित्य प्राप्त था,लेकिन उन्होंने इसे कभी व्यक्त नहीं किया । जिसे जो बता दिया वो सत्य हुआ ,लोग आज भी याद करतें है । हिन्दी साहित्य में उनका अमूल्य योगदान है , उनकी चर्चा के बिना चर्चा अधूरी रहेगी ।
                        लिखने पढने में इतना मगन हो जाते थे कि गर्मी और ठण्डी का ज्ञान न रहता । जिस कमरें में हम आप बिना बिजली के नहीं बैठते वहाँ वे अपनी लेखनी चलाते थे , खादी की सूती धोती पहनकर । जाड़े में एक सफ़ेद लोई ओढ़े जांघों पर तकिया और तकिया पर कागज कलम  । इन सभी नित्य क्रिया कलापों के दरम्यान कोई मिलने वाला आ जाय तो उससे भी हाल चाल हो जाता था  । परम पूज्य पिताजी  पूर्ण रूप से सात्विक प्रकृति के थे । सुबह शाम की पूजा के पश्चात ही वे भोजन ग्रहण करते थे । पिताजी की इन सभी नित्य क्रिया कलापों का अपनी उम्र में साक्षात्कार किया है । अंतिम समय में मैं पिताजी के साथ ही था । वो दिन भूला नहीं हूँ जब उनकी तबियत ज्यादा ख़राब थी । उस कष्ट के समय में वे संभवतः (ऐसा मेरा मानना है ) अपने प्रिय लोगों के साथ थे । याद है पिता जी की अंतिम चाय । जिसमें डॉ0 के0 एस0 द्विवेदी भाई साहब , श्री अवनीश भईया , शुक्ला जी ,श्री विनोद कुमार (श्री दिनेश कुमार द्विवेदी भाई साहब  के छोटे भाई ) , संजू (जय विक्रम त्रिपाठी )  और मैं उस अंतिम चाय के साक्षी थे । इस चाय पान के कुछ देर पहले श्री कामता भईया , पिताजी के बीमार होने के कारण पूजा करने आये थे , जा चुके थे । अंतिम समय में पिताजी ने हम सब के साथ चाय पी और थोड़ी सी चार चम्मच खिचड़ी । उस दिन माता जी  का तीज  का  व्रत  था  और वो  लोग थके  होने के  कारण सो रहे थे  । रात के  करीब  बारह  सवा  बारह  हो  रहे होंगें  । उस चाय पान के बाद मैं क्या कहूं ,कहने का लिए कुछ बचा ही नहीं । सब कुछ पञ्च तत्व में विलीन ।नश्वर शरीर बचा था , वो अंतिम संस्कार के लिए गाँव ले गये ।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

वरद हमें दो 

भादौं बिता पुनर्नवा औ बरियारी में
फूल लग गए
अब सब परिपक्व हुई गिरी वन बूटी ।
ज्यों सोने के चँवर
ढुल पड़े नन्हें नन्हें
ऐसे ही अब
लगा कुआर ,धान की बाले फूटीं ।
और कड़ी  है रम्य
इधर ग्राम्या -सी मुग्धा
यह किसान -पणिका खेत की शान्त वधूटी ।
पहन धवल टोपियाँ देश के सेवक जैसे
फूटे हैं ये काश ,
झंडियाँ जैसे फहरी ।
और इधर पड़ रहे किसी राजा के पहरे ,
प्रतिबिम्बित तालाब ,नदी में प्रतिहार -से
टहल रहे नभ के दरवाजे बादर उजरे ।
सघन हरे ईखों के गहरे खेत लहरते
हवन-धुंआ ही जैसे धरती से हो उठता ।
वन-आँगन में और वेद-उच्चारण करता ,
तालाबों के घाट ,मरालोंवाला जंगल ।
नीलम गच पर गये सजाये -
सुरभि नीर से भरे कलश धरती मंगल के
नीले,उजले ,लालरंग के कमलों के दल ।
वरद हमें दो सदा सुहावन लगाने वाला ,
इधर क्वार के साथ
धरा का परिणय मंगल !

                                         पूज्य आचार्य डॉ0 जय शंकर  त्रिपाठी द्वारा रचित 

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी जी के स्मृति में प्रकाशित  "करुणावती" त्रैमासिक पत्रिका के विमोचन के अवसर पर लिए गए कुछ चित्र 

पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी की सांतवी पुण्य तिथि पर उनकी स्मृति में साहित्य , कला एवं संस्कृति की पत्रिका "करुणावती" का विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि   स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती , अध्यक्षता कर रहे  डॉ0 सुरेश चन्द पाण्डे एवम सम्मानित अन्य विद्वद्जनों द्वारा किया ।

पूज्य पंडित जी की पुण्य तिथि प्रत्येक वर्ष 7 सितम्बर को मनायी  जाती  है । इस वर्ष 7 सितम्बर के बजाय 18 सितम्बर को पुण्यतिथि मनायी गयी। प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी पांच विद्वानों को सम्मानित किया गया ।


शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

मित्रों सूचना विलम्ब से दे रहा हूँ  18,सितम्बर-2012 को हिन्दुस्तानी एकेडमी ,इलाहाबाद में पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी की सांतवी पुण्य तिथि पर उनकी स्मृति में साहित्य,कला एवं संस्कृति की एक नयी पत्रिका का विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ,अध्यक्षता कर डॉ0 सुरेश चन्द पाण्डे एवम सम्मानित अन्य विद्वद्जनों द्वारा किया ।

        यह पुण्य तिथि कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष 7 सितम्बर को मनाया जाता है किन्तु इस बार एकेडमी काफी पहले से व्यस्त रहा जिस वजह से इस कार्यक्रम में विलम्ब हुआ ।और 7 के बजाय 18 सितम्बर को पुण्यतिथि मनायी गयी ।  प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी पांच विद्वानों को सम्मानित किया गया । जल्द ही कार्यक्रम से सम्बन्धित चित्र भी प्रकाशित किये जायेंगे ।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

                                    पिताजी की अंतिम चाय

              सेवानिवृत होने के बाद अक्सर हमारे घर के बुजुर्ग घर के कामों में हाथ बटातें है । उन कामों में जिनके लिए उनके पास कभी फुर्सत नहीं हुआ करती थी । पर कार्यालय से कार्यमुक्त होने के बाद ,साठ बसंत के बाद के बसंत बिताने के लिए बहाने ढूढने पड़ते है । कुछेक को छोड़कर बाकी सभी लोग अमूमन घर में ही समय बिताने के बहाने ढूढा किया करते है । ये बहाने घर में आसानी से मिल भी जाते है । सुबह-शाम डेरी पर जाकर ताजा दूध लाना ,सुबह नाती -पोतों को स्कूल छोड़ना और दोपहर में ले आना ,घर में कुत्ता पाल रक्खा हो तो उसको सुबह शाम टहलाना ।घर लोग अगर कहीं बाहर गए हो तो उनके गैर हाजिरी में घर की चौकीदारी । इसके अतिरिक्त भी बहुत छोटे -मोटे काम है घर में समय बिताने के लिए ।
             परम पूज्य  डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी  को जून सन 1990 में ईश्वर शरण डिग्री कालेज ,इलाहाबाद से सेवानिवृत होने के बाद हमने कभी नहीं देखा कि उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन हुआ ।सिर्फ एक कालेज जाना छोड़कर बाकी सभी दिनचर्या उनकी यथावत रही ।बल्कि उनके पास आने वाले लोगों के स्वभाव व दिनचर्या बदल जाते थे ।अध्यात्म सम्बन्धी प्रवचन तो नहीं होता था लेकिन आध्यात्मिक चिंतन मनन होता रहता था । नौजवान साथियों को उनके पास आकर सुकून मिलता था , अपनापन मिलता था ।घर के बुजुर्ग की तरह से उनसे अपनी परेशानियाँ कहते थे और सुख दुःख बांटते थे व् कुछ नया करने से पहले उनसे राय लेते थे । पंडितजी पढ़ने पढ़ाने के पुराने व्यसनी थे । सुबह के अखबार के साथ साथ चाय पान उनकी पुरानी आदत थी , शायद हम लोगों के जन्म से पहले की । अखबार के छोटी सी छोटी खबर पर उनकी पैनी निगाह रहती थी ।खबरों को पढने के बाद उस पर चर्चा, सुबह के समय जो भी आगंतुक आते उनसे उन विषयों पर चर्चा हो जाती । वे अखबारों की बातों को चर्चा तक ही सीमित रखते थे और उसके बाद वे अपने दुसरे नित्य कर्मों में  लग जाते थे । पंडित जी किसी एक विषय के ज्ञाता या विद्वान नहीं वरन हिंदी संस्कृत के अतिरिक्त भूगोल , समाजशास्त्र और ज्योतिष आदि पर भी अधिकार रखते थे । इतिहास में उनकी बड़ी रुचि थी । इतिहास सम्बन्धी पंडित जी की बातें बड़ी प्रमाणिक हुआ करती थी , जिसे लोग आज भी याद करते है ।इतिहास लेखकों में वे अन्य लोगों के साथ भगवतशरण उपाध्याय जी के नाम की चर्चा अवश्य करते । ज्योतिष में उन्हें पांडित्य प्राप्त था,लेकिन उन्होंने इसे कभी व्यक्त नहीं किया । जिसे जो बता दिया वो सत्य हुआ ,लोग आज भी याद करतें है । हिन्दी साहित्य में उनका अमूल्य योगदान है , उनकी चर्चा के बिना चर्चा अधूरी रहेगी ।
                        लिखने पढने में इतना मगन हो जाते थे कि गर्मी और ठण्डी का ज्ञान न रहता । जिस कमरें में हम आप बिना बिजली के नहीं बैठते वहाँ वे अपनी लेखनी चलाते थे , खादी की सूती धोती पहनकर । जाड़े में एक सफ़ेद लोई ओढ़े जांघों पर तकिया और तकिया पर कागज कलम  । इन सभी नित्य क्रिया कलापों के दरम्यान कोई मिलने वाला आ जाय तो उससे भी हाल चाल हो जाता था  । परम पूज्य पिताजी  पूर्ण रूप से सात्विक प्रकृति के थे । सुबह शाम की पूजा के पश्चात ही वे भोजन ग्रहण करते थे । पिताजी की इन सभी नित्य क्रिया कलापों का अपनी उम्र में साक्षात्कार किया है । अंतिम समय में मैं पिताजी के साथ ही था । वो दिन भूला नहीं हूँ जब उनकी तबियत ज्यादा ख़राब थी । उस कष्ट के समय में वे संभवतः (ऐसा मेरा मानना है ) अपने प्रिय लोगों के साथ थे । याद है पिता जी की अंतिम चाय । जिसमें डॉ0 के0 एस0 द्विवेदी भाई साहब , श्री अवनीश भईया , शुक्ला जी ,श्री विनोद कुमार (श्री दिनेश कुमार द्विवेदी भाई साहब  के छोटे भाई ) , संजू (जय विक्रम त्रिपाठी )  और मैं उस अंतिम चाय के साक्षी थे । इस चाय पान के कुछ देर पहले श्री कामता भईया , पिताजी के बीमार होने के कारण पूजा करने आये थे , जा चुके थे । अंतिम समय में पिताजी हम सब के साथ चाय पी और थोड़ी सी चार चम्मच खिचड़ी । उस माता जी  का तीज  का  व्रत  था  और वो  लोग थके  होने के  कारण सो रहे थे  । रात के  करीब  बारह  सवा  बारह  हो  रहे होंगें  । उस चाय पान के बाद मैं क्या कहूं ,कहने का लिए कुछ बचा ही नहीं । सब कुछ पञ्च तत्व में विलीन ।नश्वर शरीर बचा था , वो अंतिम संस्कार के लिए गाँव ले गये ।


                                                                                      आनन्द विक्रम त्रिपाठी ----

रविवार, 19 अगस्त 2012


               आपके स्वर में

 नहीं कोई अब घर में
जो कर पाए साहित्य सृजन
नए स्वर में
संभालना वही बहुत मुश्किल है
सृजन कर गए जो आप
अपने स्वर में
नहीं एक बूँद स्याही हमारी कलम में
जो कर पाए साहित्य सृजन
आपके स्वर में
इच्छा तो बहुत है गढ़ूं कुछ आपकी तरह
लिखूं कुछ आपकी तरह
पर बहुत मुश्किल है
साहित्य सृजन में
इन्तजार है कि 
हो कोई दूसरा 
आपकी तरह इस घर में 
जो कर पाए साहित्य सृजन
नए स्वर में
कुछ नयी रचे रचना ,हो जो 
साहित्य में नया 
रहे जो आपकी तरह 
आपके स्वर में  । 

                          ( पूज्य पंडित जी की याद में उनको श्रध्दांजलि )   आनंद  

रविवार, 29 जुलाई 2012

 इस चित्र में पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी के साथ प्रोफेसर के0 डी0 वाजपेई "रचनाकार डॉ0 जयशंकर  त्रिपाठी"  का विमोचन करते हुए -                                       

                        

पंडितजी ने निबंध , नाटक , कवितायेँ आदि तो लिखा ही साथ ही साथ कहानियाँ भी लिखी । कहानियाँ भी कपोल - कल्पित नहीं बल्कि पौराणिक व् ऐतिहासिक । उन्हीं कहानी संग्रहों में से एक कहानी है  । 

                                                                     --समाधी की भेंट--

                 "यही स्त्री है जिसनें आखेट को मारा है "।  सुनकर घोड़े पर बढ़ता हुआ माढव्य का  राजकुमार कड़क कर बोला ---'बंदी बनाओ ' ।
                  नीचे  कलकल  स्वर में शरद  कालीन  निर्मल  जलवाली  नदी  तीव्र  गति से ढुलक रही  थी । दोनों  वहीँ  पर हरे -बहरे वृक्ष ,बाँस , लताएँ , पच्छिमी  समुद्र की ओर जाते हुये को  हवायें  नतमस्तक  होकर  नमस्कार  कर रहे  थे । आकाश  में  पीले , लाल  बादलों के  शील खण्ड  समुद्र  में  तैर जैसे  रहे थे । तट  के  पास  ही  धनुष  बाण लिए  एक युवती  एक चट्टान  के पास  खड़ी  हुई  मरे  हुए  सिंह  की ओर  दृष्टि  लगाये  थी । उसी  समय हरे - भरे  वृक्षों के  झुरमुट  से घोड़ों पर चढ़े  तलवार , भाले , धनुष बाण   लिए   बहुत  से   सवार बढ़े और  स्त्री  को  बंदी  बना  लिया । एक  बूढ़े  सवार  ने कहा - ' क्या  स्त्री को  बंदी  बनाते  हो ?'
                  राजकुमार जोरदार शब्दों में उठा -" एक क्षत्रिय राजकुमार के आखेट पर अधम जाति  की जंगली स्त्री अपने बाण चलायें और उसका आखेट करें लें , यह बहुत बड़ा अपमान है  । ठीक है बंदी रक्खो , फिर विचार कर लेंगे ।"  
                  ध्वज अभिनन्दन समाप्त होने ही वाला था , आकाश के बादल उसके अभिनन्दन में उमड़ घुमड़ कर तांडव कर रहे थे । सहसा बारह साल का बालक  अभिवादन  करते हुये  बोला ' हे देशाधिपति  । मुझे भी ध्वज अभिनन्दन की आज्ञा हो ।'
' इस कार्य के लिये आज्ञा  लेने की क्या आवश्यकता ?'
नहीं आवश्यकता है ,जब तक  नहीं मेरी  माता  बन्दिनी  है  मैं  ध्वजार्चन कैसे करूँ ?
"कौन माता बन्दिनी  है ?"
'मेरी माता ।'
'क्यों ?'
अन्याय से
किसका अन्याय ।
इतने में एक सरदार आगे बढ़ा और बोला ---'राजकुमार जिसने आपके आखेट का वध किया था , और जो आपकी आज्ञा से बन्दिनी हुई , वह स्त्री इसी की माता है । वह आपके सेना नायक की  प्रणयिनी  और श्रृंगल  राज्य  के पर्वतियों  की राजकुमारी  है । सेना नायक  की मृत्यु हो जाने पर  वह  विधवा  हो गई तथा  आपकी हताहत  सेना के  साथ  आपके राज्य में चली आई  और जंगल में  रहकर  जीविका  निर्वाह  करती है  । सेना  नायक के  द्व़ारा  प्रसूत  यह  उसी का लड़का  है  और यह ठीक  भी  है  कि  इसकी  वीर माता  बन्दिनी  है  तब यह वीर पुत्र  ध्वजा  - अभिनन्दन  कैसे  करे   ?'
क्या  कहा सरदार  ?  मेरे सेना  नायक  की वीर  वधू  मेरी  माता  मेरे द्वारा बन्दिनी  बनाई  गई  ?
'हाँ ' ऐसी  ही बात  है  राजकुमार  ।
तो बन्धन -मुक्त  मेरी माता  का  शीघ्र  अभिनन्दन  होना  चाहिए ।
माढव्य  और श्रृंग राज्य की वर्षो बाद पुनः मुठभेड़ होने जा रही है । राजकुमार मुझे सेनापति का  भार  दे रहें है । माता की क्या आज्ञा है ?
कर्तव्य  का  पालन  करना  चाहिए ,  मैं  और  कुछ  नहीं  चाहती , यह  मेरे  पुत्र  का  देश  है  और  वह  पिता - माता  का  देश  का देश  । मैं  किसी  के  जय - पराजय से प्रसन्न नहीं  हूँ , हाँ  दोनों की कर्तव्य निष्ठता  देखकर  मुझे  दोनों और  से  प्रसन्नता  है  ।
वह  सब तो ठीक है किन्तु पुत्र की विजय  करानें के लिये  माता को भी तलवार  लेकर  चलना  होगा  ।
क्या वीर पुत्र  विजय करने  में  असमर्थ  है ?
अवश्य  क्योंकि  वह तो अपने युवा  पिता , माढव्य राज्य के सेना नायक  की समाधि को  रक्तधारा  से स्नान कराने  चलेगा और माता उसके स्थान पर राष्ट्र की विजय करायेंगी ।
यह सुनकर माता शील ने कहा -'मैं  अपनी  मातृभूमि   में कौन  सा  उपहार  प्राप्त  करने  चलूंगी , केवल  प्रणाम , मातृभूमि के देशद्रोह  विरह - पर्व  का स्मरण  करने ।'
नहीं  माता  । नहीं पुत्र को विजय प्रसाद  देने के लिए  पुत्र के द्वारा पिता की  समाधि  पर  अर्चना करने के लिए चलना  होगा ।  अभी राजकुमार भी अपनी विनय वाणी लेकर  आने  वाले है  ।
माता  बहुत देर तक मौन  याही , प्रातःकाल  का उपक्रम  जंगल  में चारो  ओर  गूंजने  लगा  ।भगवान  हिरण्य गर्भ सूर्य का रथ चहल -पहल  के साथ एकान्त प्रान्त  आकाश  में बढने लगा । बहुत देर के विचार- विमर्श  के बाद  माता  ने कहा  - अच्छा ठीक है  , शिव पार्थिव  को नमस्कार  करो  और जाओ  राजकुमार को आने से रोक दो ।
बड़े घोर संग्राम के बाद विजय का सन्देश मातृभूमि  को सुनानें सेना के प्रमुख माढव्य राज्य के द्वार पर पहुंचे - 'विजयते राजकुमार ।' की ध्वनि  होने लगी । राजकुमार  ने आगे बढ़कर कहा- 'माता और  सेनापति  कहाँ है  ? सैनिको ने कहा - वो तो शिव पार्थिव की ओर  गये ।'तब लौटो , माता के द्वारा विजय अभिनन्दन  होगा । सभी शिव - पार्थिव की ओर  चलें ।' कहते हुए रक्त से सना हुआ राजकुमार  सभी सैनिको के साथ  वनस्थित  शिव पार्थिव की ओर चले ।
सभी नजदीक पहुँच रहे थे , इतने में  माता - पुत्र  की आवाज  आई -' ओह विजय की तत्क्षण  ही अश्रुओं से धो उठी । शोक ---------------- क्या है ? क्या है ? कहकर सभी तडफडाते हुए निकट पहुँच गए ।
युद्ध के घावो से बेचैन माता  शिव पार्थिव  के पास  समाधिस्थ  हो चुकी थी , सेनाधीश के साथ सभी की अविराम  अश्रुधार बह चली ।
भगवान भास्कर  के रथ में दो घंटे की देर थी , उत्तर रात्रि  के उषाकाल  की बेला में सेनापति  माता की समाधि के बोल रहा था ----------इस बार मात -पितृ  दोनों कुलों के रक्त से भुथल राज्य में अपने राष्ट्र  की विजय पताका आषाढ़  मांस के वीर बुंद की तर करूँगा  ।
जैसे प्रतिध्वनि सी होने लगी - तो क्या चाहते हो  ?
माता का आशीष प्रसाद ।
माता का प्रसाद  था कब नहीं ?
कुछ देर शान्ति  छाई रही पुनः  शिव पार्थिव की ओर  से जैसे ध्वनि   आई  - विजय पताका ही तर  होगी ।
और जो आज्ञा  दी जाय ।
आज्ञा  क्या है  कुछ नहीं ।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

"संस्कृत साहित्य रचना का इतिहास"  के  विमोचन  पर  डॉ0  चन्द्र  विजय  चतुर्वेदी , पूज्य  डॉ0 जयशंकर  त्रिपाठी , माननीय  दीनानाथ  मिश्र , पूर्व लोकसेवा आयोग अध्यक्ष डॉ0 के0 बी0 पाण्डेय एवं श्री बलबीर सिंह पुंज मंचासीन ।   


                                                                                                                      

 आदरणीय पाठक बन्धु "पूज्य  पंडित  जयशंकर  त्रिपाठी  व्यक्तित्व  एवं  कृतित्व " ब्लॉग  पर  आप  सभी  का हार्दिक  अभिनन्दन और  स्वागत है। यह  ब्लॉग  आप  लोगों  के  लिए  और पंडित  जी के व्यक्तित्व  एवं  कृतित्व  से  प्रभावित हुए सभी आदरणीय बंधुजनों के लिए पूज्य पंडित जी पर अपनी भावनावों  को  व्यक्त करने लिये मंच है  । इस मंच पर आप सभी  आदरणीय  बन्धुजन  सादर  आमंत्रित   है । हम आपका बेसब्री  से इन्तजार कर  रहें  है ।      

             

                    गुरूजी

गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
विषय कोई भी अछूता न था
हर विषय पढ़ते रहे लोग उनसे
इतिहास हो ,हिन्दी हो या हो संस्कृत
विज्ञान और राजनीति की बात करते लोग उनसे
ज्योतिष हो , गणित हो या हो समाजशास्त्र
विधि और तंत्र की बात करते लोग उनसे
गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
विद्यालय से अवकाश मिले तो उनको
एक जमाना हो गया
फिर भी आते रहे लोग , पढ़ते रहे उनसे
इस विद्यालय के छात्रों की
उम्र की कोई सीमा न थी
पन्द्रह हो पच्चीस हो ,तीस -पैतीस ,चालीस हो
पैतालीस पचपन आयु के पढ़ते रहे लोग उनसे 

गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
इस विद्यालय की डिग्री में 
कभी सीलन , कभी चूहे 
या खो जाने का डर नहीं रहता 
गुरूजी का नाम उनके नाम के आगे जुड़ जाना 
जो पढ़ते रहे लोग उनसे 
वही डिग्री है 
जो उनके साथ है 
 चाहें कहीं भी रहें 
जो पढ़ते रहे लोग उनसे ।  

(तत्कालीन राज्यपाल माननीय श्री मोतीलाल वोरा पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ,लखनऊ की तरफ से महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार से सम्मानित करते हुये )

स्मृतियों के रश्मिपुंज

चित्र  में  (बाएं से दायें ) डॉ0  सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय , पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी , तत्कालीन  विधानसभा  अध्यक्ष  माननीय  केशरी नाथ  त्रिपाठी जी  डॉ0 त्रिपाठी जी  की "घाटी के परिसंवाद  " पुस्तक  का  विमोचन  करते  हुये  ।                                           

                  धरती की गोद में कभी -कभी ऐसे महनीय व्यक्तित्व का अवतरण होता है ,जिसके पौरुष और मेधा के अप्रतिम संयोग से अध्यात्म ,इतिहास और समाज के नये स्वरूप का निर्माण होता है । ऐसा ही प्रशस्य एवं उद्दात व्यक्तित्व था डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी का । इलाहाबाद जनपद के बेदौली (मांडा )ग्राम में जन्मे इस प्रखर पुरोधा ने अपने साहित्य - सृजन, आध्यात्मिक चिंतन एवं निर्भीक तथा अक्खड़ स्वभाव के कारण नित नये कीर्तिमान स्थापित किये ,नए पथों का सृजन किया । पुरूषार्थ ही मनुष्य की पहचान है ,इस विचारधारा का पोषण न केवल उन्होंने किया बल्कि उनके सानिध्य में आने वाले व्यक्तियों ने भी इसी का अनुसरण किया । डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी कभी गतानुगतिक नहीं रहे ।

                  डॉ0  त्रिपाठी  की साहित्य -सृजन यात्रा काफी लम्बी रही है । इनकी रचनाओं में लोक माटी की गंध और काव्य शास्त्रीय प्रौढ़ता तथा चिंतन के प्रखर स्फुल्लिंग सभी का सभी का एकत्र समन्वय मिलता है । उनकी पहली कविता  "हम कठिन करेजा के किसान " के आकाशवाणी से प्रकाशित होने से लेकर अंतिम कृति " संस्कृत साहित्य रचना का इतिहास "   तक की अवधि में आंजनेय , पर्वत से झांकता वक्र नयन , साहित्य में क्ष त्र ज्ञ , विस्मय के विकल्प  , आठवां अमृत , गाता हुआ पहाड़  ,आदि कितनी ऐसी रचनाएँ है  , जो उस कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा की साक्षी है ।---पूज्य  पंडित  जी पर यह संक्षिप्त  टिप्पणी डॉ0 बिमल चन्द शुक्ल,  ई0 सी0 सी0  इलाहाबाद द्वारा  पंडितजी पर लिखा लघु काव्य संग्रह  '"गुरूजी " के लिए  भूमिका  स्वरूप लिखी थी ।भूमिका का यह आधा भाग ही है ।----