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रविवार, 29 जुलाई 2012

 इस चित्र में पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी के साथ प्रोफेसर के0 डी0 वाजपेई "रचनाकार डॉ0 जयशंकर  त्रिपाठी"  का विमोचन करते हुए -                                       

                        

पंडितजी ने निबंध , नाटक , कवितायेँ आदि तो लिखा ही साथ ही साथ कहानियाँ भी लिखी । कहानियाँ भी कपोल - कल्पित नहीं बल्कि पौराणिक व् ऐतिहासिक । उन्हीं कहानी संग्रहों में से एक कहानी है  । 

                                                                     --समाधी की भेंट--

                 "यही स्त्री है जिसनें आखेट को मारा है "।  सुनकर घोड़े पर बढ़ता हुआ माढव्य का  राजकुमार कड़क कर बोला ---'बंदी बनाओ ' ।
                  नीचे  कलकल  स्वर में शरद  कालीन  निर्मल  जलवाली  नदी  तीव्र  गति से ढुलक रही  थी । दोनों  वहीँ  पर हरे -बहरे वृक्ष ,बाँस , लताएँ , पच्छिमी  समुद्र की ओर जाते हुये को  हवायें  नतमस्तक  होकर  नमस्कार  कर रहे  थे । आकाश  में  पीले , लाल  बादलों के  शील खण्ड  समुद्र  में  तैर जैसे  रहे थे । तट  के  पास  ही  धनुष  बाण लिए  एक युवती  एक चट्टान  के पास  खड़ी  हुई  मरे  हुए  सिंह  की ओर  दृष्टि  लगाये  थी । उसी  समय हरे - भरे  वृक्षों के  झुरमुट  से घोड़ों पर चढ़े  तलवार , भाले , धनुष बाण   लिए   बहुत  से   सवार बढ़े और  स्त्री  को  बंदी  बना  लिया । एक  बूढ़े  सवार  ने कहा - ' क्या  स्त्री को  बंदी  बनाते  हो ?'
                  राजकुमार जोरदार शब्दों में उठा -" एक क्षत्रिय राजकुमार के आखेट पर अधम जाति  की जंगली स्त्री अपने बाण चलायें और उसका आखेट करें लें , यह बहुत बड़ा अपमान है  । ठीक है बंदी रक्खो , फिर विचार कर लेंगे ।"  
                  ध्वज अभिनन्दन समाप्त होने ही वाला था , आकाश के बादल उसके अभिनन्दन में उमड़ घुमड़ कर तांडव कर रहे थे । सहसा बारह साल का बालक  अभिवादन  करते हुये  बोला ' हे देशाधिपति  । मुझे भी ध्वज अभिनन्दन की आज्ञा हो ।'
' इस कार्य के लिये आज्ञा  लेने की क्या आवश्यकता ?'
नहीं आवश्यकता है ,जब तक  नहीं मेरी  माता  बन्दिनी  है  मैं  ध्वजार्चन कैसे करूँ ?
"कौन माता बन्दिनी  है ?"
'मेरी माता ।'
'क्यों ?'
अन्याय से
किसका अन्याय ।
इतने में एक सरदार आगे बढ़ा और बोला ---'राजकुमार जिसने आपके आखेट का वध किया था , और जो आपकी आज्ञा से बन्दिनी हुई , वह स्त्री इसी की माता है । वह आपके सेना नायक की  प्रणयिनी  और श्रृंगल  राज्य  के पर्वतियों  की राजकुमारी  है । सेना नायक  की मृत्यु हो जाने पर  वह  विधवा  हो गई तथा  आपकी हताहत  सेना के  साथ  आपके राज्य में चली आई  और जंगल में  रहकर  जीविका  निर्वाह  करती है  । सेना  नायक के  द्व़ारा  प्रसूत  यह  उसी का लड़का  है  और यह ठीक  भी  है  कि  इसकी  वीर माता  बन्दिनी  है  तब यह वीर पुत्र  ध्वजा  - अभिनन्दन  कैसे  करे   ?'
क्या  कहा सरदार  ?  मेरे सेना  नायक  की वीर  वधू  मेरी  माता  मेरे द्वारा बन्दिनी  बनाई  गई  ?
'हाँ ' ऐसी  ही बात  है  राजकुमार  ।
तो बन्धन -मुक्त  मेरी माता  का  शीघ्र  अभिनन्दन  होना  चाहिए ।
माढव्य  और श्रृंग राज्य की वर्षो बाद पुनः मुठभेड़ होने जा रही है । राजकुमार मुझे सेनापति का  भार  दे रहें है । माता की क्या आज्ञा है ?
कर्तव्य  का  पालन  करना  चाहिए ,  मैं  और  कुछ  नहीं  चाहती , यह  मेरे  पुत्र  का  देश  है  और  वह  पिता - माता  का  देश  का देश  । मैं  किसी  के  जय - पराजय से प्रसन्न नहीं  हूँ , हाँ  दोनों की कर्तव्य निष्ठता  देखकर  मुझे  दोनों और  से  प्रसन्नता  है  ।
वह  सब तो ठीक है किन्तु पुत्र की विजय  करानें के लिये  माता को भी तलवार  लेकर  चलना  होगा  ।
क्या वीर पुत्र  विजय करने  में  असमर्थ  है ?
अवश्य  क्योंकि  वह तो अपने युवा  पिता , माढव्य राज्य के सेना नायक  की समाधि को  रक्तधारा  से स्नान कराने  चलेगा और माता उसके स्थान पर राष्ट्र की विजय करायेंगी ।
यह सुनकर माता शील ने कहा -'मैं  अपनी  मातृभूमि   में कौन  सा  उपहार  प्राप्त  करने  चलूंगी , केवल  प्रणाम , मातृभूमि के देशद्रोह  विरह - पर्व  का स्मरण  करने ।'
नहीं  माता  । नहीं पुत्र को विजय प्रसाद  देने के लिए  पुत्र के द्वारा पिता की  समाधि  पर  अर्चना करने के लिए चलना  होगा ।  अभी राजकुमार भी अपनी विनय वाणी लेकर  आने  वाले है  ।
माता  बहुत देर तक मौन  याही , प्रातःकाल  का उपक्रम  जंगल  में चारो  ओर  गूंजने  लगा  ।भगवान  हिरण्य गर्भ सूर्य का रथ चहल -पहल  के साथ एकान्त प्रान्त  आकाश  में बढने लगा । बहुत देर के विचार- विमर्श  के बाद  माता  ने कहा  - अच्छा ठीक है  , शिव पार्थिव  को नमस्कार  करो  और जाओ  राजकुमार को आने से रोक दो ।
बड़े घोर संग्राम के बाद विजय का सन्देश मातृभूमि  को सुनानें सेना के प्रमुख माढव्य राज्य के द्वार पर पहुंचे - 'विजयते राजकुमार ।' की ध्वनि  होने लगी । राजकुमार  ने आगे बढ़कर कहा- 'माता और  सेनापति  कहाँ है  ? सैनिको ने कहा - वो तो शिव पार्थिव की ओर  गये ।'तब लौटो , माता के द्वारा विजय अभिनन्दन  होगा । सभी शिव - पार्थिव की ओर  चलें ।' कहते हुए रक्त से सना हुआ राजकुमार  सभी सैनिको के साथ  वनस्थित  शिव पार्थिव की ओर चले ।
सभी नजदीक पहुँच रहे थे , इतने में  माता - पुत्र  की आवाज  आई -' ओह विजय की तत्क्षण  ही अश्रुओं से धो उठी । शोक ---------------- क्या है ? क्या है ? कहकर सभी तडफडाते हुए निकट पहुँच गए ।
युद्ध के घावो से बेचैन माता  शिव पार्थिव  के पास  समाधिस्थ  हो चुकी थी , सेनाधीश के साथ सभी की अविराम  अश्रुधार बह चली ।
भगवान भास्कर  के रथ में दो घंटे की देर थी , उत्तर रात्रि  के उषाकाल  की बेला में सेनापति  माता की समाधि के बोल रहा था ----------इस बार मात -पितृ  दोनों कुलों के रक्त से भुथल राज्य में अपने राष्ट्र  की विजय पताका आषाढ़  मांस के वीर बुंद की तर करूँगा  ।
जैसे प्रतिध्वनि सी होने लगी - तो क्या चाहते हो  ?
माता का आशीष प्रसाद ।
माता का प्रसाद  था कब नहीं ?
कुछ देर शान्ति  छाई रही पुनः  शिव पार्थिव की ओर  से जैसे ध्वनि   आई  - विजय पताका ही तर  होगी ।
और जो आज्ञा  दी जाय ।
आज्ञा  क्या है  कुछ नहीं ।