(जो उम्रभर पढ़ाते रहे और पढ़ते रहे लोगउनसे)
शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
सोमवार, 10 सितंबर 2012
पिताजी की अंतिम चाय
सेवानिवृत होने के बाद अक्सर हमारे घर के बुजुर्ग घर के कामों में हाथ बटातें है । उन कामों में जिनके लिए उनके पास कभी फुर्सत नहीं हुआ करती थी । पर कार्यालय से कार्यमुक्त होने के बाद ,साठ बसंत के बाद के बसंत बिताने के लिए बहाने ढूढने पड़ते है । कुछेक को छोड़कर बाकी सभी लोग अमूमन घर में ही समय बिताने के बहाने ढूढा किया करते है । ये बहाने घर में आसानी से मिल भी जाते है । सुबह-शाम डेरी पर जाकर ताजा दूध लाना ,सुबह नाती -पोतों को स्कूल छोड़ना और दोपहर में ले आना ,घर में कुत्ता पाल रक्खा हो तो उसको सुबह शाम टहलाना ।घर लोग अगर कहीं बाहर गए हो तो उनके गैर हाजिरी में घर की चौकीदारी । इसके अतिरिक्त भी बहुत छोटे -मोटे काम है घर में समय बिताने के लिए ।
परम पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी को जून सन 1990 में ईश्वर शरण डिग्री कालेज ,इलाहाबाद से सेवानिवृत होने के बाद हमने कभी नहीं देखा कि उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन हुआ ।सिर्फ एक कालेज जाना छोड़कर बाकी सभी दिनचर्या उनकी यथावत रही ।बल्कि उनके पास आने वाले लोगों के स्वभाव व दिनचर्या बदल जाते थे ।अध्यात्म सम्बन्धी प्रवचन तो नहीं होता था लेकिन आध्यात्मिक चिंतन मनन होता रहता था । नौजवान साथियों को उनके पास आकर सुकून मिलता था , अपनापन मिलता था ।घर के बुजुर्ग की तरह से उनसे अपनी परेशानियाँ कहते थे और सुख दुःख बांटते थे व् कुछ नया करने से पहले उनसे राय लेते थे । पंडितजी पढ़ने पढ़ाने के पुराने व्यसनी थे । सुबह के अखबार के साथ साथ चाय पान उनकी पुरानी आदत थी , शायद हम लोगों के जन्म से पहले की । अखबार के छोटी सी छोटी खबर पर उनकी पैनी निगाह रहती थी ।खबरों को पढने के बाद उस पर चर्चा, सुबह के समय जो भी आगंतुक आते उनसे उन विषयों पर चर्चा हो जाती । वे अखबारों की बातों को चर्चा तक ही सीमित रखते थे और उसके बाद वे अपने दुसरे नित्य कर्मों में लग जाते थे । पंडित जी किसी एक विषय के ज्ञाता या विद्वान नहीं वरन हिंदी संस्कृत के अतिरिक्त भूगोल , समाजशास्त्र और ज्योतिष आदि पर भी अधिकार रखते थे । इतिहास में उनकी बड़ी रुचि थी । इतिहास सम्बन्धी पंडित जी की बातें बड़ी प्रमाणिक हुआ करती थी , जिसे लोग आज भी याद करते है ।इतिहास लेखकों में वे अन्य लोगों के साथ भगवतशरण उपाध्याय जी के नाम की चर्चा अवश्य करते । ज्योतिष में उन्हें पांडित्य प्राप्त था,लेकिन उन्होंने इसे कभी व्यक्त नहीं किया । जिसे जो बता दिया वो सत्य हुआ ,लोग आज भी याद करतें है । हिन्दी साहित्य में उनका अमूल्य योगदान है , उनकी चर्चा के बिना चर्चा अधूरी रहेगी ।
लिखने पढने में इतना मगन हो जाते थे कि गर्मी और ठण्डी का ज्ञान न रहता । जिस कमरें में हम आप बिना बिजली के नहीं बैठते वहाँ वे अपनी लेखनी चलाते थे , खादी की सूती धोती पहनकर । जाड़े में एक सफ़ेद लोई ओढ़े जांघों पर तकिया और तकिया पर कागज कलम । इन सभी नित्य क्रिया कलापों के दरम्यान कोई मिलने वाला आ जाय तो उससे भी हाल चाल हो जाता था । परम पूज्य पिताजी पूर्ण रूप से सात्विक प्रकृति के थे । सुबह शाम की पूजा के पश्चात ही वे भोजन ग्रहण करते थे । पिताजी की इन सभी नित्य क्रिया कलापों का अपनी उम्र में साक्षात्कार किया है । अंतिम समय में मैं पिताजी के साथ ही था । वो दिन भूला नहीं हूँ जब उनकी तबियत ज्यादा ख़राब थी । उस कष्ट के समय में वे संभवतः (ऐसा मेरा मानना है ) अपने प्रिय लोगों के साथ थे । याद है पिता जी की अंतिम चाय । जिसमें डॉ0 के0 एस0 द्विवेदी भाई साहब , श्री अवनीश भईया , शुक्ला जी ,श्री विनोद कुमार (श्री दिनेश कुमार द्विवेदी भाई साहब के छोटे भाई ) , संजू (जय विक्रम त्रिपाठी ) और मैं उस अंतिम चाय के साक्षी थे । इस चाय पान के कुछ देर पहले श्री कामता भईया , पिताजी के बीमार होने के कारण पूजा करने आये थे , जा चुके थे । अंतिम समय में पिताजी हम सब के साथ चाय पी और थोड़ी सी चार चम्मच खिचड़ी । उस माता जी का तीज का व्रत था और वो लोग थके होने के कारण सो रहे थे । रात के करीब बारह सवा बारह हो रहे होंगें । उस चाय पान के बाद मैं क्या कहूं ,कहने का लिए कुछ बचा ही नहीं । सब कुछ पञ्च तत्व में विलीन ।नश्वर शरीर बचा था , वो अंतिम संस्कार के लिए गाँव ले गये ।
परम पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी को जून सन 1990 में ईश्वर शरण डिग्री कालेज ,इलाहाबाद से सेवानिवृत होने के बाद हमने कभी नहीं देखा कि उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन हुआ ।सिर्फ एक कालेज जाना छोड़कर बाकी सभी दिनचर्या उनकी यथावत रही ।बल्कि उनके पास आने वाले लोगों के स्वभाव व दिनचर्या बदल जाते थे ।अध्यात्म सम्बन्धी प्रवचन तो नहीं होता था लेकिन आध्यात्मिक चिंतन मनन होता रहता था । नौजवान साथियों को उनके पास आकर सुकून मिलता था , अपनापन मिलता था ।घर के बुजुर्ग की तरह से उनसे अपनी परेशानियाँ कहते थे और सुख दुःख बांटते थे व् कुछ नया करने से पहले उनसे राय लेते थे । पंडितजी पढ़ने पढ़ाने के पुराने व्यसनी थे । सुबह के अखबार के साथ साथ चाय पान उनकी पुरानी आदत थी , शायद हम लोगों के जन्म से पहले की । अखबार के छोटी सी छोटी खबर पर उनकी पैनी निगाह रहती थी ।खबरों को पढने के बाद उस पर चर्चा, सुबह के समय जो भी आगंतुक आते उनसे उन विषयों पर चर्चा हो जाती । वे अखबारों की बातों को चर्चा तक ही सीमित रखते थे और उसके बाद वे अपने दुसरे नित्य कर्मों में लग जाते थे । पंडित जी किसी एक विषय के ज्ञाता या विद्वान नहीं वरन हिंदी संस्कृत के अतिरिक्त भूगोल , समाजशास्त्र और ज्योतिष आदि पर भी अधिकार रखते थे । इतिहास में उनकी बड़ी रुचि थी । इतिहास सम्बन्धी पंडित जी की बातें बड़ी प्रमाणिक हुआ करती थी , जिसे लोग आज भी याद करते है ।इतिहास लेखकों में वे अन्य लोगों के साथ भगवतशरण उपाध्याय जी के नाम की चर्चा अवश्य करते । ज्योतिष में उन्हें पांडित्य प्राप्त था,लेकिन उन्होंने इसे कभी व्यक्त नहीं किया । जिसे जो बता दिया वो सत्य हुआ ,लोग आज भी याद करतें है । हिन्दी साहित्य में उनका अमूल्य योगदान है , उनकी चर्चा के बिना चर्चा अधूरी रहेगी ।
लिखने पढने में इतना मगन हो जाते थे कि गर्मी और ठण्डी का ज्ञान न रहता । जिस कमरें में हम आप बिना बिजली के नहीं बैठते वहाँ वे अपनी लेखनी चलाते थे , खादी की सूती धोती पहनकर । जाड़े में एक सफ़ेद लोई ओढ़े जांघों पर तकिया और तकिया पर कागज कलम । इन सभी नित्य क्रिया कलापों के दरम्यान कोई मिलने वाला आ जाय तो उससे भी हाल चाल हो जाता था । परम पूज्य पिताजी पूर्ण रूप से सात्विक प्रकृति के थे । सुबह शाम की पूजा के पश्चात ही वे भोजन ग्रहण करते थे । पिताजी की इन सभी नित्य क्रिया कलापों का अपनी उम्र में साक्षात्कार किया है । अंतिम समय में मैं पिताजी के साथ ही था । वो दिन भूला नहीं हूँ जब उनकी तबियत ज्यादा ख़राब थी । उस कष्ट के समय में वे संभवतः (ऐसा मेरा मानना है ) अपने प्रिय लोगों के साथ थे । याद है पिता जी की अंतिम चाय । जिसमें डॉ0 के0 एस0 द्विवेदी भाई साहब , श्री अवनीश भईया , शुक्ला जी ,श्री विनोद कुमार (श्री दिनेश कुमार द्विवेदी भाई साहब के छोटे भाई ) , संजू (जय विक्रम त्रिपाठी ) और मैं उस अंतिम चाय के साक्षी थे । इस चाय पान के कुछ देर पहले श्री कामता भईया , पिताजी के बीमार होने के कारण पूजा करने आये थे , जा चुके थे । अंतिम समय में पिताजी हम सब के साथ चाय पी और थोड़ी सी चार चम्मच खिचड़ी । उस माता जी का तीज का व्रत था और वो लोग थके होने के कारण सो रहे थे । रात के करीब बारह सवा बारह हो रहे होंगें । उस चाय पान के बाद मैं क्या कहूं ,कहने का लिए कुछ बचा ही नहीं । सब कुछ पञ्च तत्व में विलीन ।नश्वर शरीर बचा था , वो अंतिम संस्कार के लिए गाँव ले गये ।
आनन्द विक्रम त्रिपाठी ----
रविवार, 19 अगस्त 2012
आपके स्वर में
नहीं कोई अब घर में
जो कर पाए साहित्य सृजन
नए स्वर में
संभालना वही बहुत मुश्किल है
सृजन कर गए जो आप
अपने स्वर में
नहीं एक बूँद स्याही हमारी कलम में
जो कर पाए साहित्य सृजन
आपके स्वर में
इच्छा तो बहुत है गढ़ूं कुछ आपकी तरह
लिखूं कुछ आपकी तरह
पर बहुत मुश्किल है
साहित्य सृजन में
इन्तजार है कि
हो कोई दूसरा
आपकी तरह इस घर में
जो कर पाए साहित्य सृजन
नए स्वर में
कुछ नयी रचे रचना ,हो जो
साहित्य में नया
रहे जो आपकी तरह
आपके स्वर में ।
( पूज्य पंडित जी की याद में उनको श्रध्दांजलि ) आनंद
रविवार, 29 जुलाई 2012
इस चित्र में पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी के साथ प्रोफेसर के0 डी0 वाजपेई "रचनाकार डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी" का विमोचन करते हुए -
पंडितजी ने निबंध , नाटक , कवितायेँ आदि तो लिखा ही साथ ही साथ कहानियाँ भी लिखी । कहानियाँ भी कपोल - कल्पित नहीं बल्कि पौराणिक व् ऐतिहासिक । उन्हीं कहानी संग्रहों में से एक कहानी है ।
--समाधी की भेंट--
"यही स्त्री है जिसनें आखेट को मारा है "। सुनकर घोड़े पर बढ़ता हुआ माढव्य का राजकुमार कड़क कर बोला ---'बंदी बनाओ ' ।
नीचे कलकल स्वर में शरद कालीन निर्मल जलवाली नदी तीव्र गति से ढुलक रही थी । दोनों वहीँ पर हरे -बहरे वृक्ष ,बाँस , लताएँ , पच्छिमी समुद्र की ओर जाते हुये को हवायें नतमस्तक होकर नमस्कार कर रहे थे । आकाश में पीले , लाल बादलों के शील खण्ड समुद्र में तैर जैसे रहे थे । तट के पास ही धनुष बाण लिए एक युवती एक चट्टान के पास खड़ी हुई मरे हुए सिंह की ओर दृष्टि लगाये थी । उसी समय हरे - भरे वृक्षों के झुरमुट से घोड़ों पर चढ़े तलवार , भाले , धनुष बाण लिए बहुत से सवार बढ़े और स्त्री को बंदी बना लिया । एक बूढ़े सवार ने कहा - ' क्या स्त्री को बंदी बनाते हो ?'
राजकुमार जोरदार शब्दों में उठा -" एक क्षत्रिय राजकुमार के आखेट पर अधम जाति की जंगली स्त्री अपने बाण चलायें और उसका आखेट करें लें , यह बहुत बड़ा अपमान है । ठीक है बंदी रक्खो , फिर विचार कर लेंगे ।"
ध्वज अभिनन्दन समाप्त होने ही वाला था , आकाश के बादल उसके अभिनन्दन में उमड़ घुमड़ कर तांडव कर रहे थे । सहसा बारह साल का बालक अभिवादन करते हुये बोला ' हे देशाधिपति । मुझे भी ध्वज अभिनन्दन की आज्ञा हो ।'
' इस कार्य के लिये आज्ञा लेने की क्या आवश्यकता ?'
नहीं आवश्यकता है ,जब तक नहीं मेरी माता बन्दिनी है मैं ध्वजार्चन कैसे करूँ ?
"कौन माता बन्दिनी है ?"
'मेरी माता ।'
'क्यों ?'
अन्याय से
किसका अन्याय ।
इतने में एक सरदार आगे बढ़ा और बोला ---'राजकुमार जिसने आपके आखेट का वध किया था , और जो आपकी आज्ञा से बन्दिनी हुई , वह स्त्री इसी की माता है । वह आपके सेना नायक की प्रणयिनी और श्रृंगल राज्य के पर्वतियों की राजकुमारी है । सेना नायक की मृत्यु हो जाने पर वह विधवा हो गई तथा आपकी हताहत सेना के साथ आपके राज्य में चली आई और जंगल में रहकर जीविका निर्वाह करती है । सेना नायक के द्व़ारा प्रसूत यह उसी का लड़का है और यह ठीक भी है कि इसकी वीर माता बन्दिनी है तब यह वीर पुत्र ध्वजा - अभिनन्दन कैसे करे ?'
क्या कहा सरदार ? मेरे सेना नायक की वीर वधू मेरी माता मेरे द्वारा बन्दिनी बनाई गई ?
'हाँ ' ऐसी ही बात है राजकुमार ।
तो बन्धन -मुक्त मेरी माता का शीघ्र अभिनन्दन होना चाहिए ।
माढव्य और श्रृंग राज्य की वर्षो बाद पुनः मुठभेड़ होने जा रही है । राजकुमार मुझे सेनापति का भार दे रहें है । माता की क्या आज्ञा है ?
कर्तव्य का पालन करना चाहिए , मैं और कुछ नहीं चाहती , यह मेरे पुत्र का देश है और वह पिता - माता का देश का देश । मैं किसी के जय - पराजय से प्रसन्न नहीं हूँ , हाँ दोनों की कर्तव्य निष्ठता देखकर मुझे दोनों और से प्रसन्नता है ।
वह सब तो ठीक है किन्तु पुत्र की विजय करानें के लिये माता को भी तलवार लेकर चलना होगा ।
क्या वीर पुत्र विजय करने में असमर्थ है ?
अवश्य क्योंकि वह तो अपने युवा पिता , माढव्य राज्य के सेना नायक की समाधि को रक्तधारा से स्नान कराने चलेगा और माता उसके स्थान पर राष्ट्र की विजय करायेंगी ।
यह सुनकर माता शील ने कहा -'मैं अपनी मातृभूमि में कौन सा उपहार प्राप्त करने चलूंगी , केवल प्रणाम , मातृभूमि के देशद्रोह विरह - पर्व का स्मरण करने ।'
नहीं माता । नहीं पुत्र को विजय प्रसाद देने के लिए पुत्र के द्वारा पिता की समाधि पर अर्चना करने के लिए चलना होगा । अभी राजकुमार भी अपनी विनय वाणी लेकर आने वाले है ।
माता बहुत देर तक मौन याही , प्रातःकाल का उपक्रम जंगल में चारो ओर गूंजने लगा ।भगवान हिरण्य गर्भ सूर्य का रथ चहल -पहल के साथ एकान्त प्रान्त आकाश में बढने लगा । बहुत देर के विचार- विमर्श के बाद माता ने कहा - अच्छा ठीक है , शिव पार्थिव को नमस्कार करो और जाओ राजकुमार को आने से रोक दो ।
बड़े घोर संग्राम के बाद विजय का सन्देश मातृभूमि को सुनानें सेना के प्रमुख माढव्य राज्य के द्वार पर पहुंचे - 'विजयते राजकुमार ।' की ध्वनि होने लगी । राजकुमार ने आगे बढ़कर कहा- 'माता और सेनापति कहाँ है ? सैनिको ने कहा - वो तो शिव पार्थिव की ओर गये ।'तब लौटो , माता के द्वारा विजय अभिनन्दन होगा । सभी शिव - पार्थिव की ओर चलें ।' कहते हुए रक्त से सना हुआ राजकुमार सभी सैनिको के साथ वनस्थित शिव पार्थिव की ओर चले ।
सभी नजदीक पहुँच रहे थे , इतने में माता - पुत्र की आवाज आई -' ओह विजय की तत्क्षण ही अश्रुओं से धो उठी । शोक ---------------- क्या है ? क्या है ? कहकर सभी तडफडाते हुए निकट पहुँच गए ।
युद्ध के घावो से बेचैन माता शिव पार्थिव के पास समाधिस्थ हो चुकी थी , सेनाधीश के साथ सभी की अविराम अश्रुधार बह चली ।
भगवान भास्कर के रथ में दो घंटे की देर थी , उत्तर रात्रि के उषाकाल की बेला में सेनापति माता की समाधि के बोल रहा था ----------इस बार मात -पितृ दोनों कुलों के रक्त से भुथल राज्य में अपने राष्ट्र की विजय पताका आषाढ़ मांस के वीर बुंद की तर करूँगा ।
जैसे प्रतिध्वनि सी होने लगी - तो क्या चाहते हो ?
माता का आशीष प्रसाद ।
माता का प्रसाद था कब नहीं ?
कुछ देर शान्ति छाई रही पुनः शिव पार्थिव की ओर से जैसे ध्वनि आई - विजय पताका ही तर होगी ।
और जो आज्ञा दी जाय ।
आज्ञा क्या है कुछ नहीं ।
राजकुमार जोरदार शब्दों में उठा -" एक क्षत्रिय राजकुमार के आखेट पर अधम जाति की जंगली स्त्री अपने बाण चलायें और उसका आखेट करें लें , यह बहुत बड़ा अपमान है । ठीक है बंदी रक्खो , फिर विचार कर लेंगे ।"
ध्वज अभिनन्दन समाप्त होने ही वाला था , आकाश के बादल उसके अभिनन्दन में उमड़ घुमड़ कर तांडव कर रहे थे । सहसा बारह साल का बालक अभिवादन करते हुये बोला ' हे देशाधिपति । मुझे भी ध्वज अभिनन्दन की आज्ञा हो ।'
' इस कार्य के लिये आज्ञा लेने की क्या आवश्यकता ?'
नहीं आवश्यकता है ,जब तक नहीं मेरी माता बन्दिनी है मैं ध्वजार्चन कैसे करूँ ?
"कौन माता बन्दिनी है ?"
'मेरी माता ।'
'क्यों ?'
अन्याय से
किसका अन्याय ।
इतने में एक सरदार आगे बढ़ा और बोला ---'राजकुमार जिसने आपके आखेट का वध किया था , और जो आपकी आज्ञा से बन्दिनी हुई , वह स्त्री इसी की माता है । वह आपके सेना नायक की प्रणयिनी और श्रृंगल राज्य के पर्वतियों की राजकुमारी है । सेना नायक की मृत्यु हो जाने पर वह विधवा हो गई तथा आपकी हताहत सेना के साथ आपके राज्य में चली आई और जंगल में रहकर जीविका निर्वाह करती है । सेना नायक के द्व़ारा प्रसूत यह उसी का लड़का है और यह ठीक भी है कि इसकी वीर माता बन्दिनी है तब यह वीर पुत्र ध्वजा - अभिनन्दन कैसे करे ?'
क्या कहा सरदार ? मेरे सेना नायक की वीर वधू मेरी माता मेरे द्वारा बन्दिनी बनाई गई ?
'हाँ ' ऐसी ही बात है राजकुमार ।
तो बन्धन -मुक्त मेरी माता का शीघ्र अभिनन्दन होना चाहिए ।
माढव्य और श्रृंग राज्य की वर्षो बाद पुनः मुठभेड़ होने जा रही है । राजकुमार मुझे सेनापति का भार दे रहें है । माता की क्या आज्ञा है ?
कर्तव्य का पालन करना चाहिए , मैं और कुछ नहीं चाहती , यह मेरे पुत्र का देश है और वह पिता - माता का देश का देश । मैं किसी के जय - पराजय से प्रसन्न नहीं हूँ , हाँ दोनों की कर्तव्य निष्ठता देखकर मुझे दोनों और से प्रसन्नता है ।
वह सब तो ठीक है किन्तु पुत्र की विजय करानें के लिये माता को भी तलवार लेकर चलना होगा ।
क्या वीर पुत्र विजय करने में असमर्थ है ?
अवश्य क्योंकि वह तो अपने युवा पिता , माढव्य राज्य के सेना नायक की समाधि को रक्तधारा से स्नान कराने चलेगा और माता उसके स्थान पर राष्ट्र की विजय करायेंगी ।
यह सुनकर माता शील ने कहा -'मैं अपनी मातृभूमि में कौन सा उपहार प्राप्त करने चलूंगी , केवल प्रणाम , मातृभूमि के देशद्रोह विरह - पर्व का स्मरण करने ।'
नहीं माता । नहीं पुत्र को विजय प्रसाद देने के लिए पुत्र के द्वारा पिता की समाधि पर अर्चना करने के लिए चलना होगा । अभी राजकुमार भी अपनी विनय वाणी लेकर आने वाले है ।
माता बहुत देर तक मौन याही , प्रातःकाल का उपक्रम जंगल में चारो ओर गूंजने लगा ।भगवान हिरण्य गर्भ सूर्य का रथ चहल -पहल के साथ एकान्त प्रान्त आकाश में बढने लगा । बहुत देर के विचार- विमर्श के बाद माता ने कहा - अच्छा ठीक है , शिव पार्थिव को नमस्कार करो और जाओ राजकुमार को आने से रोक दो ।
बड़े घोर संग्राम के बाद विजय का सन्देश मातृभूमि को सुनानें सेना के प्रमुख माढव्य राज्य के द्वार पर पहुंचे - 'विजयते राजकुमार ।' की ध्वनि होने लगी । राजकुमार ने आगे बढ़कर कहा- 'माता और सेनापति कहाँ है ? सैनिको ने कहा - वो तो शिव पार्थिव की ओर गये ।'तब लौटो , माता के द्वारा विजय अभिनन्दन होगा । सभी शिव - पार्थिव की ओर चलें ।' कहते हुए रक्त से सना हुआ राजकुमार सभी सैनिको के साथ वनस्थित शिव पार्थिव की ओर चले ।
सभी नजदीक पहुँच रहे थे , इतने में माता - पुत्र की आवाज आई -' ओह विजय की तत्क्षण ही अश्रुओं से धो उठी । शोक ---------------- क्या है ? क्या है ? कहकर सभी तडफडाते हुए निकट पहुँच गए ।
युद्ध के घावो से बेचैन माता शिव पार्थिव के पास समाधिस्थ हो चुकी थी , सेनाधीश के साथ सभी की अविराम अश्रुधार बह चली ।
भगवान भास्कर के रथ में दो घंटे की देर थी , उत्तर रात्रि के उषाकाल की बेला में सेनापति माता की समाधि के बोल रहा था ----------इस बार मात -पितृ दोनों कुलों के रक्त से भुथल राज्य में अपने राष्ट्र की विजय पताका आषाढ़ मांस के वीर बुंद की तर करूँगा ।
जैसे प्रतिध्वनि सी होने लगी - तो क्या चाहते हो ?
माता का आशीष प्रसाद ।
माता का प्रसाद था कब नहीं ?
कुछ देर शान्ति छाई रही पुनः शिव पार्थिव की ओर से जैसे ध्वनि आई - विजय पताका ही तर होगी ।
और जो आज्ञा दी जाय ।
आज्ञा क्या है कुछ नहीं ।
बुधवार, 25 जुलाई 2012
"संस्कृत साहित्य रचना का इतिहास" के विमोचन पर डॉ0 चन्द्र विजय चतुर्वेदी , पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी , माननीय दीनानाथ मिश्र , पूर्व लोकसेवा आयोग अध्यक्ष डॉ0 के0 बी0 पाण्डेय एवं श्री बलबीर सिंह पुंज मंचासीन ।
आदरणीय पाठक बन्धु "पूज्य पंडित जयशंकर त्रिपाठी व्यक्तित्व एवं कृतित्व " ब्लॉग पर आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन और स्वागत है। यह ब्लॉग आप लोगों के लिए और पंडित जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से प्रभावित हुए सभी आदरणीय बंधुजनों के लिए पूज्य पंडित जी पर अपनी भावनावों को व्यक्त करने लिये मंच है । इस मंच पर आप सभी आदरणीय बन्धुजन सादर आमंत्रित है । हम आपका बेसब्री से इन्तजार कर रहें है ।
गुरूजी
गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
विषय कोई भी अछूता न था
हर विषय पढ़ते रहे लोग उनसे
इतिहास हो ,हिन्दी हो या हो संस्कृत
विज्ञान और राजनीति की बात करते लोग उनसे
ज्योतिष हो , गणित हो या हो समाजशास्त्र
विधि और तंत्र की बात करते लोग उनसे
गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
विद्यालय से अवकाश मिले तो उनको
एक जमाना हो गया
फिर भी आते रहे लोग , पढ़ते रहे उनसे
इस विद्यालय के छात्रों की
उम्र की कोई सीमा न थी
पन्द्रह हो पच्चीस हो ,तीस -पैतीस ,चालीस हो
पैतालीस पचपन आयु के पढ़ते रहे लोग उनसे
गुरूजी
जो उम्र भर पढ़ाते रहे
और पढ़ते रहे लोग उनसे
इस विद्यालय की डिग्री में
कभी सीलन , कभी चूहे
या खो जाने का डर नहीं रहता
गुरूजी का नाम उनके नाम के आगे जुड़ जाना
जो पढ़ते रहे लोग उनसे
वही डिग्री है
जो उनके साथ है
चाहें कहीं भी रहें
जो पढ़ते रहे लोग उनसे ।
(तत्कालीन राज्यपाल माननीय श्री मोतीलाल वोरा पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ,लखनऊ की तरफ से महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार से सम्मानित करते हुये )
स्मृतियों के रश्मिपुंज
चित्र में (बाएं से दायें ) डॉ0 सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय , पूज्य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी , तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष माननीय केशरी नाथ त्रिपाठी जी डॉ0 त्रिपाठी जी की "घाटी के परिसंवाद " पुस्तक का विमोचन करते हुये ।
धरती की गोद में कभी -कभी ऐसे महनीय व्यक्तित्व का अवतरण होता है ,जिसके पौरुष और मेधा के अप्रतिम संयोग से अध्यात्म ,इतिहास और समाज के नये स्वरूप का निर्माण होता है । ऐसा ही प्रशस्य एवं उद्दात व्यक्तित्व था डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी का । इलाहाबाद जनपद के बेदौली (मांडा )ग्राम में जन्मे इस प्रखर पुरोधा ने अपने साहित्य - सृजन, आध्यात्मिक चिंतन एवं निर्भीक तथा अक्खड़ स्वभाव के कारण नित नये कीर्तिमान स्थापित किये ,नए पथों का सृजन किया । पुरूषार्थ ही मनुष्य की पहचान है ,इस विचारधारा का पोषण न केवल उन्होंने किया बल्कि उनके सानिध्य में आने वाले व्यक्तियों ने भी इसी का अनुसरण किया । डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी कभी गतानुगतिक नहीं रहे ।
डॉ0 त्रिपाठी की साहित्य -सृजन यात्रा काफी लम्बी रही है । इनकी रचनाओं में लोक माटी की गंध और काव्य शास्त्रीय प्रौढ़ता तथा चिंतन के प्रखर स्फुल्लिंग सभी का सभी का एकत्र समन्वय मिलता है । उनकी पहली कविता "हम कठिन करेजा के किसान " के आकाशवाणी से प्रकाशित होने से लेकर अंतिम कृति " संस्कृत साहित्य रचना का इतिहास " तक की अवधि में आंजनेय , पर्वत से झांकता वक्र नयन , साहित्य में क्ष त्र ज्ञ , विस्मय के विकल्प , आठवां अमृत , गाता हुआ पहाड़ ,आदि कितनी ऐसी रचनाएँ है , जो उस कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा की साक्षी है ।---पूज्य पंडित जी पर यह संक्षिप्त टिप्पणी डॉ0 बिमल चन्द शुक्ल, ई0 सी0 सी0 इलाहाबाद द्वारा पंडितजी पर लिखा लघु काव्य संग्रह '"गुरूजी " के लिए भूमिका स्वरूप लिखी थी ।भूमिका का यह आधा भाग ही है ।----
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